धारा 118- गेर कृषक हिमाचली भी चाहते हैं सामान दर्जा

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गैर कृषक हिमाचली की एकमात्र मांग है कि नागरिकों की दो श्रेणियां जो Himachal Pradesh tenancy and land reforms act 1972 की धारा 118 लागू करते वक्त छूट देने से रह गई थी उन्हें इसमें शामिल कर लेना चाहिए। गेर कृषक एकता मंच ’के सदस्य सुनील जोशी ने बताया “अधिनियम के अध्याय XI में ‘भूमि के हस्तांतरण पर नियंत्रण’ में धारा 118 शामिल है जो बताता है कि ‘गैर-कृषकों को भूमि का हस्तांतरण वर्जित’”। अक्टूबर 1975 में अधिनियम को तत्काल प्रभाव से अधिसूचित किया गया था। इसके बाद उस अवधि से पहले यहाँ रहने वाले गैर कृषक हिमाचली को भी बाहरी राज्य के अन्य लोगों की तरह धारा 118 के कारण, बिना अनुमति के राज्य में किसी भी तरह की कृषि भूमि खरीदने से रोक दिया गया।

1975 में अधिनियम को अधिसूचित करते हुए तत्कालीन राज्य सरकार ने अधिनियम में नागरिकों की कुछ श्रेणियों के लिए अनुकूल प्रावधान रखे। उन्होंने कहा कि धारा 118 से अलग रखे जाने वाले नागरिकों नागरिकों में अनुसूचित जाति / अनुसूचित जनजाति, ग्राम के कारीगर और भूमिहीन व्यक्ति (जैसे कृषि श्रम आदि) शामिल हैं। अधिनियम के अध्याय XI की उपधारा 2 (ए) (बी) (सी) (डी) के अनुसार, राज्य के इन नागरिकों की श्रेणी को 118 से छूट मिली है। परंतु तत्कालीन सरकार इन लोगों के साथ दो और श्रेणियो के नागरिकों को इसमे शामिल करना शायद भूल गई। यह भी वह नागरिक थे जो राज्य के लिए बाकियों की ही तरह खून पसीना बहा रहे थे । उन्होंने कहा कि ये थे छोटे व्यवसायी और सरकारी कर्मचारी ।

1948 के बाद, हिमाचल को केंद्र शासित प्रदेश का हिस्सा बना दिया गया; इसके बाद 1966 में यह ग्रेटर पंजाब बन गया। इस अवधि के दौरान बाहरी राज्य से कुछ छोटे कारोबारी व्यावसाए के सिलसिले से यहाँ रहने लगे और अन्य सरकारी कर्मचारी थे। यह लोग यहीं पर बस गए और जिन्हें हम गेर कृषक हिमाचली की श्रेणी से जानते हैं  ।

“हालांकि 118 के उप-धारा 2 (जी) (एच) के अनुसार गैर कृषक नागरिक राज्य में भूमि खरीद सकते हैं। लेकिन सीमित भूमि खरीदने की अनुमति है और केवल एक बार और इसलिए इसे विशेष रूप से गैर कृषक हिमाचली नागरिकों के लिए एक अनुकूल कदम नहीं माना जा सकता है । स्वाभाविक रूप से यदि एक गैर कृषक हिमाचली नागरिक को एक समय सीमित भूमि खरीदने की अनुमति दी जाती है, तो यह उनकी आने वाली पीढ़ियों के साथ गंभीर अन्याय है। “परिवार समय के साथ बढ़ते हैं और ऐसे नागरिकों की अगली पीढ़ी भी पहाड़ी राज्य में ही जन्म लेगी। जाहिर है कि उनमें से कई काम करेंगे और यहां बसेंगे और उन्हें और जमीन की जरूरत होगी।“ जोशी ने प्रशन उठाया की क्या यह संभव की 4 इंसानों के रहने के लायक जगह मे 10 लोग गुज़ारा कर सकें ।

दुर्दशा में जोड़ने के लिए, यदि कोई गैर-कृषक हिमाचली नागरिक खेती को पेशा बनाना चाहता है, तो वह सरकारी अनुमति के साथ एक बार कृषि भूमि खरीद सकता है, लेकिन उसे ‘कृषक’ का दर्जा नहीं दिया जाएगा (धारा 118 में प्रावधान के कारण) । जोशी ने कहा यह घोर अन्याय है क्योंकि गैर-कृषक हिमाचली नागरिक भी 2-3 पीढ़ियों से पहाड़ी राज्य के लिए खून-पसीना बहा रहे हैं।

राज्य सरकार को दिए गए एक प्रतिनिधित्व में इस एसोसिएशन ने अनुरोध किया है कि इन दो श्रेणियों (पेटी व्यवसायी और सरकारी कर्मचारियों जो  निश्चित तारीख / वर्ष से पहले यहां बसे) को भी धारा 118 के उप-खंड 2 में जोड़कर राहत दी जानी चाहिए। जोशी ने माँग की  “हम में से कई जो 1974 से पहले राज्य में बस गए थे, और अभी भी यहां रह रहे हें उन्हें अन्य सभी हिमाचली नागरिकों की तरह समान दर्जा दिया जाना चाहिए।“

हालाँकि मुख्यमंत्री ने इस मामले को देखने का आश्वासन तो दिया है पर हर बार जब भी कोई सरकार धारा 118 में बदलाव करने की कोशिश करती है, तो यह एक राजनीतिक मुद्दा बन जाता और इसमें गैर कृषक हिमाचलियों की वास्तविक मांग दब जाती है।शायद कोर्ट में ही न्याय मिल पाएगा।

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